توبة يهوذا
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يا صغاري
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أنا أدري أن عاري
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قصة تنساب من دار لدار
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أنا أدري
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كلما ألتف شتاء حول نار
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وإذا ما شفة مرت باسم
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مثل اسمي
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ذكروا إثمي
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وإثمي خنجر يوغل في قلب صغاري
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أنا أدري
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أن ما لصته كفاي
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وما شادت يدي
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من قصور لغدي
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لم تعد غير شهود لدماري
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أنا أدري
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ان ما كنزت في الليل
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ومن ويل بريء
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وفقير
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من دم أهرق مرضاة شروري
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يستحيل اليوم
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في النور
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شهودا لانهياري
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*
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أنا أدري
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ان شعبي يأكل الحقد عروقه
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كلما أبصر بي الوحش الذي داس حقوقه
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كلما أبصر بي الليل الذي سد طريقه
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أنا أدري
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أي وحش
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أي ليل
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كنت يا شعبي عليك
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أنا أدري
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كيف ألقيتك في الدرب
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ولم أترك لديك
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غير جوع
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ودمار
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يا صغاري
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أي جدوى لا اعتذاري
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بعد ان أحرقت حتى بيت جاري
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يا صغاري
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أن حكم الموت لن يمسح عاري
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عن جبيني
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فهنا …
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ألف قتيل
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وهنا …
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ألف سجين
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وهنا …
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ألف صغير لم ينل غير سجوني
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أنا أدري
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أن حكم الموت لن يسمح عاري
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فأنكروني يا صغاري
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واتركوني
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اتركوني لعنة تزحف في التاريخ
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من نار لنار
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علّها
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تغسل
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عاري |